जनक–पराशर संवादः — वर्ण-गोत्र-धर्मविचारः
Janaka–Parāśara: Varṇa, Gotra, and Dharma Inquiry
जब अपने लिये अप्रसन्नताका हेतु और दुःखयुक्त भाव अनुभवमें आये तब रजोगुणकी प्रवृत्ति हुई है--ऐसा अपने मनमें विचार करे तथा वैसे किसी कार्यका आरम्भ न करके उसकी ओरसे अपना ध्यान हटा ले ।। अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् | अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत्,इसी प्रकार शरीर या मनमें जो मोहयुक्त भाव अतर्कित या अविज्ञातरूपसे उपस्थित हो गया हो, उसके विषयमें यही निश्चय करे कि यह तमोगुण है
atha yad moha-saṁyuktaṁ kāye manasi vā bhavet | apratarkyam avijñeyaṁ tamas tad upadhārayet ||
अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥
भीष्म उवाच