जनक–पराशर संवादः — वर्ण-गोत्र-धर्मविचारः
Janaka–Parāśara: Varṇa, Gotra, and Dharma Inquiry
असमृद्धिस्तथा दैन्यं प्रमोह: स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदुपवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणा:,यदि किसी प्रकार अविद्या, राग, मोह, प्रमाद, स्तब्धता, भय, दरिद्रता, दीनता, प्रमोह (मूर्च्छा), स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष आ घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप जाने
असमृद्धिस्तथा दैन्यं प्रमोहः स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदुपवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥
भीष्म उवाच