अध्याय २८१ — दानधर्मः, न्यायागतधनम्, ऋणत्रय-परिशोधनं च
Dāna ethics, lawful wealth, and settling obligations
वज़्िणं मृगयामास तदा भरतसत्तम | धर्मज्ञ राजेन्द्र! भरतसत्तम! उसके सारे अंग रक्तसे भींगे हुए थे। उसने चीर और वल्कल पहन रखे थे। ऐसे विकराल रूपवाली वह भयानक ब्रह्महत्या वृत्रके शरीरसे निकलकर तत्काल ही वज्रधारी इन्द्रको खोजने लगी
vajriṇaṁ mṛgayāmāsa tadā bharatasattama | dharmajña rājendra bharatasattama |
भीष्म उवाच— तदा सा घोरदर्शना ब्रह्महत्यामूर्तिः, रक्तलिप्ताङ्गी चीरवल्कलधारिणी, वृत्रस्य देहात् सहसा निष्क्रम्य वज्रधरं देवेन्द्रं मृगयामास। धर्मज्ञ राजेन्द्र, भरतसत्तम!
भीष्म उवाच