अध्याय २८१ — दानधर्मः, न्यायागतधनम्, ऋणत्रय-परिशोधनं च
Dāna ethics, lawful wealth, and settling obligations
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें वृत्रायुरका वधविषयक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २८१ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ई श्लोक मिलाकर कुछ ४४ ३ “लोक हैं) मा जम (> दयशीर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: वृत्रासुरका वध और उससे कह ई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन भीष्म उवाच वृत्रस्थ तु महाराज ज्वराविष्टस्य सर्वश: । अभवन् यानि लिज्भनि शरीरे तानि मे शृणु,भीष्मजी कहते हैं--महाराज! ज्वरसे आविष्ट हुए वृत्रासुरके शरीरमें जो लक्षण प्रकट हुए थे, उन्हें मुझसे सुनो
bhīṣma uvāca | vṛtrasya tu mahārāja jvarāviṣṭasya sarvaśaḥ | abhavan yāni liṅgāni śarīre tāni me śṛṇu ||
भीष्म उवाच—वृत्रस्थ तु महाराज ज्वराविष्टस्य सर्वशः। अभवन् यानि लिङ्गानि शरीरे तानि मे शृणु॥
भीष्म उवाच