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Shloka 1

Parāśara’s Counsel on बुद्धि (Discernment), Karma-Consequences, and Avoidance of Pāpānubandha Actions

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वृत्रगीताविषयक दो सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २८० ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ शलोक मिलाकर कुल ७० ३ *लोक हैं) भीस्न्ह+ज (2) अमना - श्रीविष्णुपुराणमें तीन प्रकारकी प्राकृत सृष्टि बतायी गयी है--पहली महत्तत्त्वकी सृष्टि है, जिसे यहाँ 'क्षर' शब्दसे कहा गया है। दूसरी भूत-सृष्टि मानी गयी है, जो तन्मात्राओंकी सृष्टि है। यहाँ “भूतेषु” पदके द्वारा उसीकी ओर संकेत किया गया है। 'एकादशविकारात्मा” इस पदके द्वारा तीसरी सृष्टिका निर्देश किया गया है, जिसे वैकारिक अथवा ऐन्द्रियक सर्ग भी कहते हैं। इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन--इन ग्यारह तत्त्वोंकी रचना हुई है। - सोलह ऋत्विजोंके नाम इस प्रकार हैं--१-ब्रह्मा, २-ब्राह्मणाच्छंसी, ३-आग्नीध्र और ४-पोता--ये चार ऋत्विज सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता होते हैं। ५-होता, ६-मैत्रावरुण, ७-अछावाक और ८-ग्रावस्तोता--ये चार ऋत्विज ऋग्वेदी होते हैं। ९- अध्वर्यु, १०-प्रतिपस्थाता, ११-नेष्टा और १२-उन्नेता--ये चार यजुर्वेदी होते हैं। १३-उदगाता, १४-प्रस्तोता, १५-प्रतिहर्ता तथा १६-सुब्रह्मण्य--ये सामवेदके गायक होते हैं। > जब तमोगुणकी अधिकता, सत्त्वगुणकी न्यूनता और रजोगुणकी सम अवस्था हो, तब कृष्णवर्ण होता है। यह स्थावर सृष्टिका रंग माना गया है। तमोगुणकी अधिकता, रजोगुणकी न्यूनता और सत्त्वगुणकी सम अवस्था होनेपर धूम्रवर्ण होता है। यह पशु-पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेवाले प्राणियोंका वर्ण माना गया है। रजोगुणकी अधिकता, सत्त्वगुणकी न्‍्यूनता और तमोगुणकी सम अवस्था होनेपर नीलवर्ण होता है। यह मानवसर्गका वर्ण बताया गया है। इसीमें जब सत्त्वमुणकी सम अवस्था और तमोगुणकी न्यूनावस्था हो तो मध्यमवर्ण होता है। उसका रंग लाल होता है। इसे अनुग्रह सर्ग कहते हैं। जब सत्त्गगुणकी अधिकता, रजोगुणकी न्यूनता और तमोगुणकी सम अवस्था हो तो हरिद्राके समान पीतवर्ण होता है। यही देवताओंका वर्ण है, अतः इसे देवसर्ग कहते हैं। उसीमें जब रजोगुणकी सम अवस्था और तमोगुणकी न्यूनता हो तो शुक्लवर्ण होता है। इसीको कौमारसर्ग कहा गया है। - दस इन्द्रिय, पाँच प्राण और चार अन्तःकरण--ये उन्नीस भोगके साधन हैं, विषय और वृत्तियोंके भेदसे इन्हींके उतने ही सौ और उतने ही हजार प्रकार हो जाते हैं। - पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय--ये दस इन्द्रियाँ सात््विक, राजसिक और तामसिक तथा जाग्रतू, स्वप्न और सुषुप्तिके भेदसे प्रत्येक छ:-छ: प्रकारकी होती हैं। इस प्रकार इनके साठ भेद हो जाते हैं। एकाशीरव्यधिकद्विशततमो<् ध्याय: इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन युधिछिर उवाच अहो धर्मिष्ठता तात वृत्रस्थामिततेजस: । यस्य विज्ञानमतुलं विष्णोर्भक्तिश्व तादृशी,युधिष्ठिरने पूछा--दादाजी! अमित तेजस्वी वृत्रासुरकी धर्मनिष्ठा अद्भुत थी। उसका विज्ञान भी अनुपम था और भगवान्‌ विष्णुके प्रति उसकी भक्ति भी वैसी ही उच्चकोटिकी थी

Yudhiṣṭhira uvāca: aho dharmiṣṭhatā tāta Vṛtrasya amitatejasaḥ, yasya vijñānam atulaṁ Viṣṇor bhaktiś ca tādṛśī.

युधिष्ठिर उवाच— अहो धर्मिष्ठता तात वृत्रस्यामिततेजसः। यस्य विज्ञानमतुलं विष्णोर्भक्तिश्च तादृशी॥

युधिष्ठिरःYudhiṣṭhira
युधिष्ठिरः:
Karta
TypeNoun
Rootयुधिष्ठिर
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid/spoke
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect, 3, Singular, Parasmaipada
अहोah!/indeed!
अहो:
TypeIndeclinable
Rootअहो
धर्मिष्ठताgreat righteousness
धर्मिष्ठता:
Karta
TypeNoun
Rootधर्मिष्ठता
FormFeminine, Nominative, Singular
तातdear father/sir (vocative)
तात:
TypeNoun
Rootतात
FormMasculine, Vocative, Singular
वृत्रस्यof Vṛtra
वृत्रस्य:
TypeNoun
Rootवृत्र
FormMasculine, Genitive, Singular
अमिततेजसःof the one of immeasurable splendor
अमिततेजसः:
TypeAdjective
Rootअमित-तेजस्
FormMasculine, Genitive, Singular
यस्यwhose
यस्य:
TypePronoun
Rootयद्
FormMasculine/Neuter, Genitive, Singular
विज्ञानम्knowledge/discernment
विज्ञानम्:
Karta
TypeNoun
Rootविज्ञान
FormNeuter, Nominative, Singular
अतुलम्incomparable
अतुलम्:
TypeAdjective
Rootअतुल
FormNeuter, Nominative, Singular
विष्णोःof Viṣṇu
विष्णोः:
TypeNoun
Rootविष्णु
FormMasculine, Genitive, Singular
भक्तिःdevotion
भक्तिः:
Karta
TypeNoun
Rootभक्ति
FormFeminine, Nominative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
तादृशीsuch (of that kind)
तादृशी:
TypeAdjective
Rootतादृश
FormFeminine, Nominative, Singular

युधिछिर उवाच

Y
Yudhiṣṭhira
V
Vṛtra (Vṛtrāsura)
V
Viṣṇu
B
Bhīṣma (implied by address 'tāta' in Śānti Parva dialogue frame)