उशनसः (शुक्रस्य) चरितम् — The Account of Uśanā (Śukra): Yoga, Grievance, and Pacification
गन्धानादाय भूतानां रसांश्न विविधानपि । अवर्ध त्रीन् समाक्रम्य लोकान् वै स्वेन तेजसा,मैं बलमें बहुत बढ़ा-चढ़ा था; अत: मैंने अपने ही तेजसे तीनों लोकोंपर आक्रमण करके दूसरे प्राणियोंको धूलमें मिलाकर उनके उपभोगकी गन्ध और रस आदि विविध वस्तुएँ छीन ली थीं
गन्धानादाय भूतानां रसांश्च विविधानपि। अवर्धं त्रीन् समाक्रम्य लोकान् वै स्वेन तेजसा॥
भीष्म उवाच