Viṣṇor Māhātmya and Indriya-saṃyama (विष्णोर्माहात्म्यं तथा इन्द्रियसंयमः)
उपगम्य वने सिद्धि सर्वभूताविहिंसया । अपि मूलफलैरिष्टो यज्ञ: स्वर्ग्य: परंतप,परंतप युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणने वनमें तपस्याद्वारा सिद्धि लाभ करके समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी भी हिंसा न करते हुए मूल और फलोंद्वारा भी स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले यज्ञका अनुष्ठान किया
स वने तपसा सिद्धिमुपगम्य सर्वभूताविहिंसया। मूलफलैरपि स्वर्ग्यं यज्ञमिष्टवान्, परंतप।
नारद उवाच