परिव्राजक-आचारः (Conduct of the Wandering Renunciant) — Mahābhārata, Śānti-parva 269
वेदांश्व॒ वेदितव्यं च विदित्वा च यथास्थितिम् । एवं वेदविदित्याहुरतो5न्यो वातरेचक:,जो वेदों और उनके द्वारा जानने योग्य परब्रह्यको ठीक-ठीक जानता है, उसीको वेदवेत्ता कहते हैं। उससे भिन्न जो दूसरे लोग हैं, वे मुँहसे वेद नहीं पढ़ते, धौंकनीके समान केवल हवा छोड़ते हैं
वेदांश्च वेदितव्यं च विदित्वा च यथास्थितिम्। एवं वेदविदित्याहुरतोऽन्यो वातरेचकः॥
कपिल उवाच