नक्षत्राणीव धिष्ण्येषु बहवस्तारकागणा: । आनन्त्यमुपसम्प्राप्ता: संतोषादिति वैदिकम्,श्रेष्ठ पुरुष विधिपूर्वक उन सब आश्रमोंमें प्रवेश करके उनके धर्मका पालन करते हुए परम-गतिको प्राप्त होते हैं। उनमेंसे कुछ लोग तो घरसे निकलकर (अर्थात् संन्यासी होकर), कुछ लोग वानप्रस्थका आश्रय लेकर, कुछ मानव गृहस्थ ही रहकर और कोई ब्रह्मचर्य आश्रमका सेवन करते हुए ही उस आश्रमधर्मका पालन करके परमपदको प्राप्त होते हैं। उस समय वे ही द्विजगण आकाशमें ज्योति-मयरूपसे दिखायी देते हैं, जो कि नक्षत्रोंके समान ही आकाशके विभिन्न स्थानोंमें अनेक तारागण हैं--इन सबने संतोषके द्वारा ही यह अनन्त पद प्राप्त किया है, ऐसा वैदिक सिद्धान्त है
nakṣatrāṇīva dhiṣṇyeṣu bahavas tārakāgaṇāḥ | ānantyam upasamprāptāḥ santoṣād iti vaidikam |
कपिल उवाच—यथा नक्षत्राणि दिवि विविधेषु धिष्ण्येषु बहवस्तारकागणा इव दृश्यन्ते, तथैव बहवो द्विजा अनन्त्यं पदमुपसम्प्राप्नुवन्ति। ते संतोषेनैव तदनन्तं पदं प्राप्नुवन्तीति वैदिकः सिद्धान्तः।
कपिल उवाच
Contentment (santoṣa) is presented as a decisive means for attaining the ‘infinite’ or ultimate state; Kapila frames this as a Vedic siddhānta, using the image of countless stars to suggest many beings reaching that goal.
Kapila is instructing his listener in a didactic passage of the Śānti Parva, offering a metaphor: as stars are seen spread across the sky, so many attain the highest end; he attributes their attainment to contentment and cites it as Vedic doctrine.