तृष्णाक्षय-उपदेशः
Instruction on the Cessation of Craving
योगशास्त्रमें कथित कर्म श्रेष्ठ फल देनेवाले, उन्नति करनेवाले एवं स्थायी हैं; तो भी प्रवृत्तिमार्गी मनुष्य उनको गुणरहित (निष्फल) और अस्थिर समझते हैं ।। गुणाश्षात्र सुदुर्ज्ेया ज्ञाताश्नात्र सुदुष्करा: । अनुषछिताश्चान्तवन्त इति त्वमनुपश्यसि,गुणोंके कार्यभूत जो यज्ञ-यागादि हैं, उनके स्वरूप और विधि-विधानको समझना बहुत कठिन है। समझ लेनेपर भी उनका अनुष्ठान करना तो और भी कठिन है। यदि अनुष्ठान भी किया जाय तो भी उनसे नाशवान् फलकी ही प्राप्ति होती है। इन सब बातोंको तुम भी देखते और समझते हो
yogaśāstre kathitāni karmāṇi śreṣṭha-phaladāni, unnati-karāṇi ca sthāyīni; tathāpi pravṛtti-mārgī manuṣyās tāni guṇa-rahitāni (niṣphalāni) ca asthirāṇi manyante. guṇa-śāstrāḥ sudurjñeyāḥ, jñātāś ca saduṣkarāḥ; anuṣṭhitāś cānta-vanta iti tvam anupaśyasi.
कपिल उवाच—योगशास्त्रोक्तानि कर्माणि श्रेष्ठफलप्रदानि, उन्नतिकराणि, ध्रुवाणि चेति कथ्यन्ते; तथापि प्रवृत्तिमार्गिणो जनास्तानि गुणहीनानि चञ्चलानि चेति मन्यन्ते। गुणशास्त्रं सुदुर्ज्ञेयं, ज्ञातं च सुदुष्करम्; अनुष्ठितं चान्तवन्ति फलानीति त्वमप्यनुपश्यसि।
कपिल उवाच