पापात्म-धर्मात्म-लक्षणम् तथा निर्वेदेन मोक्षमार्गः | Marks of the Sinful and the Righteous; Dispassion (Nirveda) as a Path to Liberation
चिरकालतक सोच-विचार करके किसीके साथ मित्रता जोड़नी चाहिये और जिसे मित्र बना लिया, उसे सहसा नहीं छोड़ना चाहिये। यदि छोड़नेकी आवश्यकता पड़ ही जाय तो उसके परिणामपर चिरकालतक विचार कर लेना चाहिये। दीर्घकालतक सोच-विचार करके बनाया हुआ जो मित्र है, उसीकी मैत्री चिरकालतक टिक पाती है ।। रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि । अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते,“राग, दर्द, अभिमान, द्रोह, पापाचरण और किसीका अप्रिय करनेमें जो विलम्ब करता है, उसकी प्रशंसा की जाती है
rāge darpe ca māne ca drohe pāpe ca karmaṇi | apriye caiva kartavye cirakārī praśasyate ||
चिरकालं विचार्य कस्यचित् सह मित्रतां कुर्यात्, कृतमित्रं च सहसा न त्यजेत्। त्यागेऽवश्यं सति तस्य परिणामान् चिरं विचारयेत्। दीर्घविचारकृतं यन्मित्रं तदेव चिरं तिष्ठति॥ रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि। अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते॥
भीष्म उवाच