Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
निर्ममश्चनानहड्कारो निर्टन्डश्छिन्नसंशय: । नैव क्रुद्धय॑ति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिर:,सम: सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते । जिसने ममता और अहंकारका त्याग कर दिया है, जो शीत, उष्ण आदि द््दोंको समानभावसे सहता है, जिसके संशय दूर हो गये हैं, जो कभी क्रोध और द्वेष नहीं करता, झूठ नहीं बोलता, किसीकी गाली सुनकर और मार खाकर भी उसका अहित नहीं सोचता, सबपर मित्रभाव ही रखता है, जो मन, वाणी और कर्मसे किसी जीवको कष्ट नहीं पहुँचाता और समस्त प्राणियोंपर समानभाव रखता है, वही योगी ब्रह्मभावको प्राप्त होता है
nirmamaś cānahaṅkāro nirdaṇḍaś chinnasaṁśayaḥ | naiva krudhyati na dveṣṭi nānṛtā bhāṣate giraḥ || samaḥ sarveṣu bhūteṣu brahmāṇam abhivartate |
निर्ममो निरहङ्कारो निरुद्योगः छिन्नसंशयः। नैव क्रुध्यति न द्वेष्टि नानृतां भाषते गिरम्॥ समः सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते॥
व्यास उवाच