Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
वर्णतो गुह्ते चापि कामात् पिबति चाशयान् | आकाशको सिद्ध करनेवाला पुरुष आकाशमें आकाशके ही समान सर्वव्यापी हो जाता है। वह अपने शरीरको अन्तर्धान करनेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है। जिसका जलतत्त्वपर अधिकार होता है, वह इच्छा करते ही बड़े-बड़े जलाशयोंको पी जाता है
आकाशतत्त्वसिद्धः पुरुष आकाश इव सर्वव्यापी भवति, स्वशरीरस्य चान्तर्धानशक्तिं लभते। यस्य जलतत्त्वेऽधिकारः स्यात्, स इच्छामात्रेण महान्तोऽपि जलाशयान् पिबति।
व्यास उवाच