कर्मविद्या-भेदः
Karma–Vidyā Distinction: Paths of Bondage and Release
एवं विस्तारसंक्षेपौ ब्रह्माव्यक्ते पुन: पुन: । युगसाहस्रयोरादावहो रात्रस्तथैव च,इस प्रकार बारंबार अव्यक्त परब्रह्ममें सृष्टिका विस्तार और लय होता है। ब्रह्माजीका दिन एक हजार चतुर्युगका होता है और उनकी रात भी उतनी ही बड़ी होती है; यह बात पहले ही बता दी गयी है
एवं विस्तारसंक्षेपौ ब्रह्माव्यक्ते पुनः पुनः । युगसाहस्रयोरादावहोरात्रस्तथैव च ॥
व्यास उवाच