योग–सांख्यसमन्वयः, रथोपमा, व्यक्त–अव्यक्तविवेकः
Yoga–Sāṃkhya Synthesis, Chariot Allegory, and the Vyakta–Avyakta Distinction
सदा ही पर्वोपर विशेष स्नान करते, अपने अंगोंमें चन्दन लगाते और सुन्दर अलंकार धारण करते थे। स्वभावसे ही उपवास और तपमें लगे रहते थे। सबके विश्वासपात्र थे और वेदोंका स्वाध्याय किया करते थे ।। नैनानभ्युदियात् सूर्यो न चाप्यासन् प्रगेशया: । रात्रौ दधि च सक्तूंश्व नित्यमेव व्यवर्जयन्,दैत्य कभी प्रात:काल सोये नहीं रहते थे। उनके सोते समय सूर्य नहीं उगते थे; अर्थात् वे सूर्योदयसे पहले ही जाग उठते थे। वे रातमें कभी दही और सत्तू नहीं खाते थे
na enān abhyudiyāt sūryo na cāpy āsan prageśayāḥ | rātrau dadhi ca saktūṁś ca nityam eva vyavarjayan ||
नैनानभ्युदियात् सूर्यो न चाप्यासन् प्रगे शयाः। रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जयन्॥
शक्र उवाच