ब्राह्मणस्य पूर्वतरा वृत्तिः — The Earlier Ideal Conduct of a Brahmana
River-of-Saṃsāra Metaphor
सम्पीडयति य: कालो वृद्धि वार्धुषिको यथा । जैसे ऋण देनेवाला पुरुष व्याजका हिसाब जोड़कर ऋण लेनेवालोंको तंग करता है, उसी प्रकार वह काल दिन, रात, मास, क्षण, काष्ठा, लव और कला तकका हिसाब लगाकर प्राणियोंको पीड़ा देता रहता है
sampīḍayati yaḥ kālo vṛddhi-vārdhuṣiko yathā |
सम्पीडयति यः कालो वृद्धिवृद्धुषिको यथा। स तथा दिनरात्रिमासक्षणकाष्ठालवकलानां गणनां कृत्वा प्राणिनः सततं पीडयति॥
भीष्म उवाच