ब्राह्मणस्य पूर्वतरा वृत्तिः — The Earlier Ideal Conduct of a Brahmana
River-of-Saṃsāra Metaphor
विहरन् सर्वतो मुक्तो न क्वचित् परिषज्जते । रजश्न हि तमश्न त्वां स्पृशते न जितेन्द्रियम्,“तुम सर्वत्र विचरते हुए भी सबसे मुक्त हो। कहीं भी तुम्हारी आसक्ति नहीं है। तुमने अपनी इन्द्रियोंको जीत लिया है; इसलिये रजोगुण और तमोगुण तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकते
विहरन् सर्वतो मुक्तो न क्वचित् परिषज्जते । रजश्च हि तमश्च त्वां स्पृशते न जितेन्द्रियम् ॥
भीष्म उवाच