ब्राह्मणस्य पूर्वतरा वृत्तिः — The Earlier Ideal Conduct of a Brahmana
River-of-Saṃsāra Metaphor
ऑपन- मा बछ। अि<--छऋाज सप्तविशत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय: इन्द्र और बलिका संवाद--काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन युधिष्ठिर उदाच मग्नस्य व्यसने कृच्छे कि श्रेय: पुरुषस्य हि । बन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशे5थवा पुन:,युधिष्ठिरने पूछा--भूपाल! जो मनुष्य बन्धु-बान्धवोंका अथवा राज्यका नाश हो जानेपर घोर संकटमें पड़ गया हो, उसके कल्याणका क्या उपाय है? भरतश्रेष्ठ! इस संसारमें आप ही हमारे लिये सबसे श्रेष्ठ वक्ता हैं; इसलिये यह बात आपसे ही पूछता हूँ। आप यह सब मुझे बतानेकी कृपा करें
yudhiṣṭhira uvāca | magnasya vyasane kṛcchre kiṃ śreyaḥ puruṣasya hi | bandhunāśe mahīpāla rājyānāśe ’thavā punaḥ ||
युधिष्ठिर उवाच । मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे किं श्रेयः पुरुषस्य हि । बन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशेऽथवा पुनः ॥
भीष्म उवाच