Adhyāya 222 — ब्रह्मस्थानप्राप्ति: मोक्षधर्मे समत्वव्रतम्
Attaining the Brahman-Station: The Vow of Equanimity in Mokṣadharma
नोर्ध्व नावाड्न तिर्यक् च न क्वचिच्छक्र कामये । न हिज्ञेये न विज्ञाने न ज्ञाने कर्म विद्यते,इन्द्र! मुझे ऊपर (स्वर्गकी), नीचे (पातालकी) तथा बीचके लोक (मर्त्यलोक) की भी कभी कामना नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान और ज्ञेयके निमित्त भी मेरे लिये कोई कर्म आवश्यक नहीं है
नोर्ध्वं नाधो न तिर्यक् च न क्वचिच्छक्र कामये। न हि ज्ञेये न विज्ञाने न ज्ञाने कर्म विद्यते॥
प्रह्माद उवाच