Adhyāya 214: Tapas Redefined—Perpetual Discipline, Hospitality, and the Ethics of Eating (तपः-निरूपणम्, विघसाशी-अतिथिप्रिय-धर्मः)
पयस्यन्तर्तितं सर्पिर्यद्वन्निर्मथ्यते खजै: । शुक्र निर्मथ्यते तद्धत् देहसंकल्पजै: खजै:,जिस प्रकार दूधमें छिपे हुए घीको मथानीसे मथकर अलग किया जाता है, उसी प्रकार देहस्थ संकल्प और इन्द्रियोंसे होनेवाले स्त्रियोंके दर्शन एवं स्पर्श आदिसे मथित होकर पुरुषका वीर्य बाहर निकल जाता है
payasy antarhitaṃ sarpir yadvan nirmathyate khajaiḥ | śukraṃ nirmathyate tadvad deha-saṅkalpajaiḥ khajaiḥ ||
यथा पयसि निहितं सर्पिर्निर्मथ्यते खजैः, तथा देहसंकल्पजैः खजैः शुक्रं निर्मथ्यते नरस्य।
भीष्म उवाच