Adhyāya 214: Tapas Redefined—Perpetual Discipline, Hospitality, and the Ethics of Eating (तपः-निरूपणम्, विघसाशी-अतिथिप्रिय-धर्मः)
रागोत्पन्नश्चरेत् कृच्छों महार्ति: प्रविशेदप: । मग्न: स्वप्ने च मनसा त्रिर्जपेदघधमर्षणम्,ब्रह्मचारीके मनमें यदि राग या काम-विकार उत्पन्न हो जाय तो वह आत्मशुद्धिके लिये कृच्छुव्रतका5 आचरण करे। यदि वीर्यकी वृद्धि होनेसे उसे कामवेदना अधिक सता रही हो तो वह नदी या सरोवरके जलनमें प्रवेश करके स्नान करे। यदि स्वप्नावस्थामें वीर्यपात हो जाय तो जलमें गोता लगाकर मन-ही- मन तीन बार अघमर्षणः सूक्तका जप करे
Bhīṣma uvāca: rāgotpannaś caret kṛcchraṁ mahārtīḥ praviśed apaḥ | magnaḥ svapne ca manasā trir japet aghamarṣaṇam ||
रागोत्पन्नश्चरेत् कृच्छ्रं महार्तिः प्रविशेदपः । मग्नः स्वप्ने च मनसा त्रिर्जपेदघमर्षणम् ॥
भीष्म उवाच