Keśava-tattva-kathana
On the Principle of Keśava: Cosmogony and Divine Epithets
जापकार्थमयं यत्नो यदर्थ वयमागता: । कृतपूजाविमौ तुल्यौ त्वया तुल्यफलाविमौ,“इस जापक ब्राह्मणको सदगति देनेके लिये ही आपने ऐसा उद्योग किया था। इसीको देखनेके लिये हमलोग भी आये थे। आपने इन दोनोंका समानरूपसे आदर किया और ये दोनों ही एक-सी स्थितिमें पहुँचकर आपके समान फलके भागी हुए हैं
jāpākārtham ayaṁ yatno yadartha vayaṁ āgatāḥ | kṛtapūjāv imau tulyau tvayā tulyaphalāv imau ||
जापकार्थमयं यत्नो यदर्थ वयमागता: । कृतपूजाविमौ तुल्यौ त्वया तुल्यफलाविमौ ॥
भीष्य उवाच