जनक-राज्ञः मौण्ड्य-परिव्रज्या-विवादः
Janaka’s Renunciation Questioned; Discourse on Dāna and Detachment
तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े-चढ़े सहसरों ब्राह्मणों तथा इस सम्पूर्ण जगत्का भरण-पोषण करनेवाले होकर भी आज आप उन्हींके द्वारा अपना भरण-पोषण चाहते हैं ।। श्रियं हित्वा प्रदीप्तां त्वं श्ववत् सम्प्रति वीक्ष्यसे । अपुत्रा जननी तेड5द्य कौसल्या चापतिस्त्वया,“इस जगमगाती हुई राजलक्ष्मीको छोड़कर इस समय आप दर-दर भटकनेवाले कुत्तेके समान दिखायी देते हैं। आज आपके जीते-जी आपकी माता पुत्रहीन और यह अभागिनी कौसल्या पतिहीन हो गयी
śriyaṃ hitvā pradīptāṃ tvaṃ śvavat samprati vīkṣyase | aputrā jananī te ’dya kausalyā cāpatistvayā ||
अर्जुन उवाच—त्रैविद्यवृद्धानां ब्राह्मणानां सहस्रशो भर्ता भूत्वा लोकस्य च पालनकर्ता, अद्य तैरेव स्वभरणमिच्छसि। प्रदीप्तां श्रियमुत्सृज्य त्वं श्ववत् सम्प्रति दृश्यसे। जीवति त्वयि जननी तेऽपुत्रेव, कौसल्या चाभाग्या पतिहीनेव जाता।
अजुन उवाच