अध्याय १७८ — प्राणवायुगतिः तथा शारीराग्निव्यवस्था
Adhyāya 178 — The courses of prāṇa-vāyu and the regulation of the bodily fire
तृप्त: स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन् । न सकाम॑ करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मन:,“मैं सदा संतुष्ट एवं स्वस्थ इन्द्रियोंसे सम्पन्न रहकर भाग्यवश जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन-निर्वाह करता रहूँगा; परंतु तुओ कभी सफल न होने दूँगा; क्योंकि तू मेरा शत्रु है
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन् । न सकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः ॥
भीष्म उवाच