Adhyāya 166: Kṛtaghna-doṣa (कृतघ्नदोषः) — the fault of ingratitude and the limits of expiation
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् | याजनाध्यापनाद यौनान्न तु यानासनाशनात्,पतितके साथ रहनेसे, उसका यज्ञ करानेसे और उसे पढ़ानेसे मनुष्य एक वर्षमें पतित हो जाता है; परंतु उसकी संतानके साथ अपनी संतानका विवाह करनेसे, एक सवारी या एक आसन पर बैठनेसे तथा उसके साथमें भोजन करनेसे वह एक वर्षमें नहीं, किंतु तत्काल पतित हो जाता है
saṃvatsareṇa patati patitena sahācaran | yājanādhyāpanād yaunān na tu yānāsanāśanāt ||
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्। याजनाध्यापनाद् यौनान् न तु यानासनाशनात्॥
भीष्म उवाच