तपसो बहुरूपस्य तैस्तैद्वरि: प्रवर्ततः । निवृत्त्या वर्तमानस्य तपो नानशनात् परम्,तपस्याके अनेक रूप हैं और भिन्न-भिन्न साधनों एवं उपायोंद्वारा मनुष्य उसमें प्रवृत्त होता है; परंतु जो निवृत्तिमार्गसे चल रहा है, उसके लिये उपवाससे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है
तपसो बहुरूपस्य तैस्तैर्द्वारैः प्रवर्ततः। निवृत्त्या वर्तमानस्य तपो नानशनात् परम्॥
भीष्म उवाच