Dama-pradhāna-dharma (Self-restraint as the Root of Dharma) — Śānti-parva 154
जीवन्तमेव पश्यामि मनसा नात्र संशय: । विनाशो नास्य न हि वै सुखं प्राप्स्यथ मानुषा:,मनुष्यो! मैं तो अपने मनसे इस बालकको जीवित ही देख रहा हूँ, इसमें संशय नहीं है। इसका नाश नहीं होगा, तुम्हें अवश्य ही सुख मिलेगा
jīvantam eva paśyāmi manasā nātra saṁśayaḥ | vināśo nāsya na hi vai sukhaṁ prāpsyatha mānuṣāḥ ||
जीवन्तमेव पश्यामि मनसा नात्र संशयः। विनाशो नास्य न हि वै सुखं प्राप्स्यथ मानुषाः॥
जम्बुक उवाच