Dama-pradhāna-dharma (Self-restraint as the Root of Dharma) — Śānti-parva 154
गृध्र उदाच अश्रुपातपरिक्लिन्न: पाणिस्पर्शप्रपीडित: । धर्मराजप्रयोगाच्च दीर्घनिद्रां प्रवेशित:,गीधने कहा--तुमलोगोंके आँसू बहानेसे जिसका शरीर गीला हो गया है और जो तुम्हारे हाथोंसे बार-बार दबाया गया है, ऐसा यह बालक धर्मराजकी आज्ञासे चिरनिद्रामें प्रविष्ट हो गया है
गृध्र उवाच अश्रुपातपरिक्लिन्नः पाणिस्पर्शप्रपीडितः । धर्मराजप्रयोगाच्च दीर्घनिद्रां प्रवेशितः ॥
जम्बुक उवाच