कपोत-लुब्धकसंवादः — Hunter’s Remorse and Renunciatory Resolve
आगतागमया बुद्धया वचनेन प्रशस्यते । अज्ञानाऊज्ञानहेतुत्वाद् वचनं साधु मन््यते,वेद-शास्त्रोंके द्वारा अनुमोदित, तर्कयुक्त बुद्धिके द्वारा जो बात कही जाती है, उसीसे शास्त्रकी प्रशंसा होती है अर्थात् शास्त्रकी वही बात लोगोंके मनमें बैठती है। दूसरे लोग अज्ञातविषयका ज्ञान करानेके लिये केवल तर्कको ही श्रेष्ठ मानते हैं, परंतु यह उनकी नासमझी ही है
āgatāgamayā buddhyā vacanena praśasyate | ajñānāj jñāna-hetutvād vacanaṃ sādhu manyate ||
आगतागमया बुद्ध्या वचनेन प्रशस्यते। अज्ञानाद् ज्ञानहेतुत्वाद् वचनं साधु मन्यते॥
भीष्म उवाच