स संहृत्य च तत् कर्म अनास्वाद्य च तद्धवि: । तोषयामास देवांश्व पितृश्च द्विजसत्तम:,उन द्विजश्रेष्ठ मुनिने वह कर्म समाप्त करके उस हविष्यका आस्वादन किये बिना ही देवताओं और पितरोंको संतुष्ट कर दिया और उन्हींकी कृपासे पवित्र भोजन प्राप्त करके उसके द्वारा जीवनकी रक्षा की
स संहृत्य च तत्कर्म अनास्वाद्य च तद्धविः । तोषयामास देवान्श्च पितॄंश्च द्विजसत्तमः ॥
भीष्म उवाच