Bala and Dharma in Kṣatriya Governance (बल-धर्म सम्बन्धः)
ऑपन-माजल छा अ<-छकऋाज (आपडद्धर्मपर्व) एकत्रिशदधिकशततमो< ध्याय: आप्त्तिग्रस्त राजाके कर्तव्यका वर्णन युधिछिर उवाच क्षीणस्य दीर्घसूत्रस्य सानुक्रोशस्य बन्धुषु । परिशड्किततवृत्तस्य श्रुतमन्त्रस्य भारत,युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! जिसकी सेना और धन-सम्पत्ति क्षीण हो गयी है, जो आलसी है, बन्धु-बान्धवोंपर अधिक दया रखनेके कारण उनके नाशकी आशंकासे जो उन्हें साथ लेकर शत्रुके साथ युद्ध नहीं कर सकता, जो मन्त्री आदिके चरित्रपर संदेह रखता है अथवा जिसका चरित्र स्वयं भी शंकास्पद है, जिसकी मन्त्रणा गुप्त नहीं रह सकी है, उसे दूसरे लोगोंने सुन लिया है, जिसके नगर और राष्ट्रको कई भागोंमें बाँटकर शत्रुओंने अपने अधीन कर लिया है, इसीलिये जिसके पास द्रव्यका भी संग्रह नहीं रह गया है, द्रव्याभावके कारण ही समादर न पानेसे जिसके मित्र साथ छोड़ चुके हैं, मन्त्री भी शत्रुओंद्वारा फोड़ लिये गये हैं, जिसपर शत्रुदलका आक्रमण हो गया हो, जो दुर्बल होकर बलवान शत्रुके द्वारा पीड़ित हो और विपत्तिमें पड़कर जिसका चित्त घबरा उठा हो, उसके लिये कौन-सा कार्य शेष रह जाता है?--उसे इस संकटसे मुक्त होनेके लिये क्या करना चाहिये?
Yudhiṣṭhira uvāca: kṣīṇasya dīrghasūtrasya sānukrośasya bandhuṣu | pariśaṅkitavṛttasya śrutamantrasya bhārata ||
युधिष्ठिर उवाच— क्षीणस्य दीर्घसूत्रस्य सानुक्रोशस्य बन्धुषु । परिशङ्कितवृत्तस्य श्रुतमन्त्रस्य भारत ॥ बलवित्तक्षयप्राप्तस्य विलम्बशीलस्य च राज्ञः, बन्धुषु अतिदयालोः तेषां विनाशशङ्कया शत्रुं प्रति न निर्गन्तुं शक्नुवतः, अमात्यवृत्ते संशयिनः (अथवा स्ववृत्तेऽपि संशयितस्य), यस्य मन्त्रणा परैः श्रुता गुप्तत्वं च नष्टम्—स आपद्भिः पीडितः सन्त्रस्तचित्तः किम् अवशिष्टं कर्म? एतस्मात् संकटात् कथं विमुच्येत?
युधिछिर उवाच
The verse frames a rāja-dharma problem: when a ruler is weakened materially and psychologically, divided by misplaced compassion, and compromised by distrust and leaked strategy, he must seek a disciplined, realistic remedy—restoring secrecy, decisive action, reliable counsel, and protective measures—rather than drifting in delay and fear.
In Śānti Parva, Yudhiṣṭhira questions the elder authority (addressed as ‘Bhārata’) about what a distressed king should do when his power is depleted, his decision-making is delayed, his inner circle is unreliable or suspected, and his strategic counsel has been exposed—setting up Bhīṣma’s instruction on conduct in political calamity.