अस्तब्धं प्रश्मितं श्लक्ष्णं मृुदुवादिनमेव च । धीरं शूरं महर्द्धि च देशकालोपपादकम्,अतः राजा उसीको मन्त्री बनावे, जो कुलीन, सुशिक्षित, विद्वान, ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत, सब शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाला, सहनशील, अपने देशका निवासी, कृतज्ञ, बलवान्, क्षमाशील, मनका दमन करनेवाला, जितेन्द्रिय, निर्लोभ, जो मिल जाय उसीसे संतोष करनेवाला, स्वामी और उसके मित्रकी उन्नति चाहनेवाला, देश-कालका ज्ञाता, आवश्यक वस्तुओंके संग्रहमें तत्पर, सदा मनको वशमें रखनेवाला, स्वामीका हितैषी, आलस्य-रहित, अपने राज्यमें गुप्तचर लगाये रखनेवाला, संधि और विग्रहके अवसरको समझनेमें कुशल, राजाके धर्म, अर्थ और कामकी उन्नतिका उपाय जाननेवाला, नगर और ग्रामवासी लोगोंका प्रिय, खाईं और सुरंग खुदवाने तथा व्यूह निर्माण करानेकी कलामें कुशल, अपनी सेनाका उत्साह बढ़ानेमें प्रवीण, शकल-सूरत और चेष्टा देखकर ही मनके यथार्थ भावको समझ लेनेवाला, शत्रुओंपर चढ़ाई करनेके अवसरको समझनेमें विशेष चतुर, हाथीकी शिक्षाके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला, अहंकाररहित, निर्भीक, उदार, संयमी, बलवान, उचित कार्य करनेवाला, शुद्ध, शुद्ध पुरुषोंसे युक्त, प्रसन्नमुख, प्रियदर्शन, नेता, नीतिकुशल, श्रेष्ठ गुण और उत्तम चेष्टाओंसे सम्पन्न उद्ण्डतारहित, विनयशील, स्नेही, मृदुभाषी, धीर, शूरवीर, महान ऐश्वर्यसे सम्पन्न तथा देश और कालके अनुसार कार्य करनेवाला हो
astabdhaṁ praśmitaṁ ślakṣṇaṁ mṛduvādinaṁ eva ca | dhīraṁ śūraṁ maharddhi ca deśakālopapādakam ||
अस्तब्धं प्रश्मितं श्लक्ष्णं मृदुवादिनमेव च। धीरं शूरं महर्द्धिं च देशकालोपपादकम्॥
भीष्म उवाच
Bhishma teaches that a minister must combine inner discipline (humility, composure, gentle speech) with outer competence (courage, resources, and the practical wisdom to act according to time and place).
In the Shanti Parva’s instruction on kingship, Bhishma continues advising the ruler on how to choose capable counselors, listing key personal and administrative virtues required for effective governance.