(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ३२३ “लोक हैं) >> श््जु अीस-न्#सस - देखिये कर्णपर्व अध्याय ६९ श्लोक ३८ से ४५ तक। ३. गंगाके तटपर किसी सर्पिणीने सहस्रों अण्डे देकर रख दिये थे। उन अण्डोंको एक उल्लूने रातमें फोड़-फोड़कर नष्ट कर दिया। इससे वह महान् पुण्यका भागी हुआ; अन्यथा उन अण्डोंसे हजारों विषैले सर्प पैदा होकर कितने ही लोगोंका विनाश कर डालते। दशाधिकशततमो< ध्याय: सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दु:खोंसे छूटनेका उपाय बताना युधिषछ्िर उवाच क्लिश्यमानेषु भूतेषु तैस्तैभावैस्ततस्तत: । दुर्गाण्यतितरेद् येन तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जगतके जीव भिन्न-भिन्न भावोंके द्वारा जहाँ-तहाँ नाना प्रकारके कष्ट उठा रहे हैं; अतः जिस उपायसे मनुष्य इन दुःखोंसे छुटकारा पा सके, वह मुझे बताइये
yudhiṣṭhira uvāca |
kliśyamāneṣu bhūteṣu tais tais bhāvais tatas tataḥ |
durgāṇy atitared yena tan me brūhi pitāmaha ||
युधिष्ठिर उवाच—क्लिश्यमानेषु भूतेषु तैस्तैर्भावैस्ततस्ततः । दुर्गाण्यतितरेद्येन तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ पितामह! जगति प्राणिनो नानाभावैर्नानावस्थाभिश्च विचाल्यमानाः बहुविधं दुःखं अनुभवन्ति; तस्माद्येनोपायेन मनुष्यः एतानि दुर्गाणि तरित्वा दुःखात् प्रमुच्येत, तन्मे कथय।
युधिषछ्िर उवाच
The verse frames the ethical inquiry: since beings suffer due to shifting inner states and external conditions, one should seek a reliable means—grounded in dharma (right conduct) and higher devotion/insight—to ‘cross over’ hardship rather than be driven by changing bhāvas.
In the Śānti Parva’s instruction setting, Yudhiṣṭhira addresses the revered elder Bhīṣma (‘Pitāmaha’) and asks for practical guidance: what method enables a person to surmount the many difficulties that afflict living beings.