Satya–Anṛta Viveka (Discrimination between Truth and Falsehood) | सत्य–अनृत विवेकः
धनमित्येव पापानां सर्वेषामिह निश्चय: । जो दुष्ट धर्ममार्गसे भ्रष्ट होकर आसुरी प्रवृत्तिमें लगा रहता है और स्वधर्मका परित्याग करके पापसे जीविका चलाना चाहता है, कपटसे जीवन-निर्वाह करनेवाले उस पापात्माको सभी उपायोंसे मार डालना चाहिये; क्योंकि सभी पापात्माओंका यही विचार रहता है कि जैसे बने, वैसे धनको लूट-खसोट कर रख लिया जाय
dhanam ity eva pāpānāṃ sarveṣām iha niścayaḥ |
भीष्म उवाच— धनमित्येव पापानां सर्वेषामिह निश्चयः। ये दुष्टाः धर्ममार्गात् भ्रष्टाः आसुरीं वृत्तिं समाश्रित्य स्वधर्मं त्यक्त्वा पापेन जीविकां इच्छन्ति, कपटजीविनः ते सर्वोपायैर्निग्रहीतव्याः; यतः पापात्मनां निश्चयोऽयं—यथाकथञ्चिद् धनं लुण्ठयित्वा सञ्चिनुयाम इति।
भीष्म उवाच