Gaṇānāṃ Vṛttiḥ — On the Sustenance and Cohesion of Assemblies
Gaṇa-nīti
राज्ञां वित्त च कोशं च कोशसंचयनं जय: । अमात्यगुणवृत्तिश्व प्रकृतीनां च वर्धनम्,युधिष्ठिरने कहा--परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शाद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं। राजाओंके धन, कोश, कोश-संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि-विग्रह आदि छः: गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं--उन सब लोगोंके यथावत् लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये--इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता--इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है
rājñāṁ vittaṁ ca kośaṁ ca kośasañcayanaṁ jayaḥ | amātyaguṇavṛttiś ca prakṛtīnāṁ ca vardhanam ||
राज्ञां वित्तं च कोशं च कोशसञ्चयनं जयः। अमात्यगुणवृत्तिश्च प्रकृतीनां च वर्धनम्॥
युधिछिर उवाच