तां बुद्धिमुपजिज्ञासुस्त्वमेवैतान् परित्यज । अनर्थश्षार्थरूपेण हार्थाश्षानर्थरूपिण:,तुम पूर्वोक्त बुद्धिको समझनेकी चेष्टा करो और इन भोगोंको छोड़ो, जो तुम्हें अर्थके रूपमें प्रतीत होनेवाले अनर्थ हैं; क्योंकि वास्तवमें समस्त भोग अनर्थस्वरूप ही हैं
तां बुद्धिमुपजिज्ञासुस्त्वमेवैतान् परित्यज । अनर्थांश्चार्थरूपेण ह्यर्थांश्चानर्थरूपिणः ॥
भीष्म उवाच