त्रितयं सेवितं सर्व को नु स्वन्ततरो मया । “मैंने सभी बन्धु-बान्धवोंको सम्मान दिया। अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले लोगोंका सत्कार किया और धर्म, अर्थ एवं काम सबका सेवन कर लिया। मेरे समान सुन्दर अन्त किसका हुआ होगा? ।।
त्रितयं सेवितं सर्वं को नु स्वन्ततरो मया। आज्ञप्तं नृपमुख्येषु मानः प्राप्तः सुदुर्लभः॥
संजय उवाच