Śalya–Bhīma Gadā-saṃnipāta and Śalya’s Bāṇa-jāla against Yudhiṣṭhira
Book 9, Chapter 11
पटुघण्टाशतरवां वासवीमशनीमिव । निर्मुक्ताशीविषाकारां पृक्तां गजमदैरपि,उसमें सैकड़ों घंटियाँ लगी थीं, जिनका कलरव गूँजता रहता था। वह इन्द्रके वज्ञकी भाँति भयानक जान पड़ती थी। केंचुलसे छूटे हुए विषधर सर्पके समान वह सम्पूर्ण प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करती थी और अपनी सेनाका हर्ष बढ़ाती रहती थी। उसमें हाथीके मद लिपटे हुए थे। पर्वतशिखरोंको विदीर्ण करनेवाली वह गदा मनुष्यलोकमें सर्वत्र विख्यात है
sañjaya uvāca | paṭu-ghaṇṭā-śata-ravāṃ vāsavīm aśanīm iva | nirmuktāśīviṣākārāṃ pṛktāṃ gaja-madair api ||
सञ्जय उवाच—सा गदा पटुघण्टाशतरवां वासवीमशनीमिव भयानका बभूव। निर्मुक्ताशीविषाकारां पृक्तां गजमदैरपि, सर्वभूतमनांसि त्रासयन्ती स्वसैन्यस्य च परिहर्षं वर्धयामास।
संजय उवाच