Book 10, Adhyāya 12: Aśvatthāmā’s Request for the Cakra and the Brahmaśiras Context
“ब्रह्म! जो मनुष्य समाजमें सदा ही परम प्रामाणिक समझे जाते हैं, जिनके पास गाण्डीव धनुष और श्वेत घोड़े हैं, जिनकी ध्वजापर श्रेष्ठ वानर विराजमान होता है, जिन्होंने बन्द्रयुद्धमें साक्षात् देवदेवेश्वर नीलकण्ठ उमा-वल्लभ भगवान् शंकरको पराजित करनेका साहस करके उन्हें संतुष्ट किया था, इस भूमण्डलमें मुझे जिनसे बढ़कर परम प्रिय दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, जिनके लिये मेरे पास स्त्री, पुत्र आदि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो देने योग्य न हो, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे उस प्रिय सुहृद् कुन्तीकुमार अर्जुनने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही थी, जो आज तुम मुझसे कह रहे हो ।। ब्रह्मचर्य महद् घोरें तीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् | हिमवत्पाश्वमास्थाय यो मया तपसार्जित:
brahmacaryaṁ mahad ghore tīrtvā dvādaśavārṣikam | himavatpārśvam āsthāya yo mayā tapasārjitaḥ ||
ब्रह्मन्! यो मनुष्येषु सदा परमं प्रमाणं गतः, गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वः कपिप्रवरकेतनः; यः साक्षाद् देवदेवेशं शितिकण्ठमुमापतिं बद्धयुद्धे पराजिष्णुस्तोषयामास शङ्करम्; यस्मात् प्रियतरो नास्ति ममान्यः पुरुषो भुवि, नादेयं यस्य मे किञ्चिदपि दाराः सुतास्तथा; तेनापि सुहृदा ब्रह्मन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा नोक्तपूर्वमिदं वाक्यं यत् त्वं मामभिभाषसे ॥ ब्रह्मचर्यं महद् घोरं तीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् । हिमवत्पार्श्वमास्थाय यो मया तपसार्जितः ॥
वैशम्पायन उवाच