सौप्तिकपर्व — धृष्टद्युम्नसारथिवृत्तान्तः
Report of the Night Raid and Yudhiṣṭhira’s Lament
कर्णिनालीकरदंष्टस्य खड्गजिह्डस्य संयुगे । चापव्यात्तस्य रौद्रस्य ज्यातलस्वननादिन:,'क्रोधमें भरा हुआ कर्ण मनुष्योंमें सिंहंके समान था। कर्णि और नालीक नामक बाण उसकी दाँढ़ें तथा युद्धमें उठी हुई तलवार उसकी जिह्ला थी। धनुषका खींचना ही उसका मुँह फैलाना था। प्रत्यंचाकी टंकार ही उसके लिये दहाड़नेके समान थी। युद्धोंमें कभी पीठ न दिखानेवाले उस भयंकर पुरुषसिंहके हाथसे जो जीवित छूट गये, वे ही ये मेरे सगे-सम्बन्धी अपनी असावधानीके कारण मार डाले गये हैं
karṇinālīkaradaṁṣṭasya khaḍgajihvasya saṁyuge | cāpavyāttasya raudrasya jyātalasvananādinaḥ ||
कर्णिनालीकरदंष्ट्रस्य खड्गजिह्वस्य संयुगे । चापव्यात्तस्य रौद्रस्य ज्यातलस्वननादिनः ॥
सूत उवाच