सौप्तिकपर्व — धृष्टद्युम्नसारथिवृत्तान्तः
Report of the Night Raid and Yudhiṣṭhira’s Lament
अनर्थों हुर्थसंकाशस्तथानर्थो<र्थदर्शन: । जयो5यमजयाकारो जयस्तस्मात् पराजय:,“कभी-कभी अनर्थ भी अर्थ-सा हो जाता है और अर्थके रूपमें दिखायी देनेवाली वस्तु भी अनर्थके रूपमें परिणत हो जाती है, इसी प्रकार हमारी यह विजय भी पराजयका ही रूप धारण करके आयी थी, इसलिये जय भी पराजय बन गयी
anartho hy arthasaṅkāśas tathānartho 'rthadarśanaḥ | jayo 'yam ajayākāro jayas tasmāt parājayaḥ ||
सूतोवाच—अनर्थो ह्यर्थसंकाशस्तथानर्थोऽर्थदर्शनः । जयोऽयमजयाकारो जयस्तस्मात् पराजयः ॥
सूत उवाच