एकवस्त्राथ पाज्चाली पाण्डवानभ्यवैक्षत । हतस्वान् द्वतराज्यांश्व॒ हृतवस्त्रान् हृतश्रिय:,पांचालराजकुमारी द्रौपदी तपस्विनी है। उसका जन्म किसी मानवी स्त्रीके गर्भसे नहीं हुआ है, वह अग्निके कुलमें उत्पन्न हुई और अनुपम सुन्दरी है। वह सब धर्मोको जाननेवाली तथा यशस्विनी है। उसे भरी सभामें खींचकर लानेवाले दुष्टोंने भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाले घमासान युद्धकी सम्भावना उत्पन्न कर दी है। अधर्मपूर्वक जूआ खेलनेवाले दुर्योधनके सिवा कौन है, जो द्रौपदीको सभामें बुला सके। सुन्दर शरीरवाली पांचालराजकुमारी स्त्रीधर्मसे युक्त (रजस्वला) थी। उसका वस्त्र रक्तसे सना हुआ था। वह एक ही साड़ी पहने हुए थी। उसने सभामें आकर पाण्डवोंको देखा। उन पाण्डवोंके धन, राज्य, वस्त्र और लक्ष्मी सबका अपहरण हो चुका था। वे सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंसे वंचित हो दासभावको प्राप्त हो गये थे। धर्मके बन्धनमें बँधे रहनेके कारण वे पराक्रम दिखानेमें भी असमर्थ-से हो रहे थे
sañjaya uvāca | ekavastrātha pāñcālī pāṇḍavān abhyavaikṣata | hatasvān dhṛtarāṣṭrāṁś ca hṛtavastrān hṛtaśriyaḥ ||
एकवस्त्राथ पाञ्चाली पाण्डवानभ्यवैक्षत । हतस्वान् धृतराष्ट्रांश्च हृतवस्त्रान् हृतश्रियः ॥
संजय उवाच