Adhyāya 59: Vidura’s Admonition to Duryodhana after the Summons of Draupadī (सभा पर्व)
कुन्तीनन्दन! यदि पासा विपरीत पड़ जाय तो हम खिलाड़ियोंमेंसे एक पक्षको पराजित कर सकता है; अतः जय-पराजय दैवाधीन पासोंके ही आश्रित है। उसीसे पराजयरूप दोषकी प्राप्ति होती है। हारनेकी शंका तो हमें भी है, फिर भी हम खेलते हैं। अतः भूमिपाल! आप शंका न कीजिये, दाँव लगाइये, अब विलम्ब न कीजिये ।। युधिषछिर उवाच एवमाहायमसितो देवलो मुनिसत्तम: । इमानि लोकद्दाराणि यो वै भ्राम्यति सर्वदा,युधिष्ठिरने कहा--मुनिश्रेष्ठ असित-देवलने, जो सदा इन लोदद्दारोंमें भ्रमण करते रहते हैं, ऐसा कहा है कि जुआरियोंके साथ शठतापूर्वक जो जूआ खेला जाता है, पाप है। धर्मानुकूल विजय तो युद्धमें ही प्राप्त होती है; अतः क्षत्रियोंके लिये युद्ध ही उत्तम है, जूआ खेलना नहीं
yudhiṣṭhira uvāca | kuntīnandana! yadi pāśā viparītaṁ paḍa jāya to vayaṁ krīḍakānāṁ madhye ekaṁ pakṣaṁ parājitaṁ kartuṁ śaknoti; ataḥ jaya-parājayau daivādhīnau pāśānām eva āśritau staḥ | tasmād eva parājaya-rūpa-doṣaḥ prāpyate | hārasya śaṅkā tu asmākam api asti, tathāpi vayaṁ krīḍāmaḥ | ataḥ bhūmipāla! tvaṁ śaṅkāṁ mā kṛthāḥ, dāvaṁ nidhatsva, adhunā vilambaṁ mā kṛthāḥ || evam āha ayam asito devalo munisattamaḥ | imāni lokadvārāṇi yo vai bhrāmyati sarvadā ...
युधिष्ठिर उवाच—कुन्तीनन्दन! यदि पाशा विपरीतं पतन्ति तदा क्रीडकेषु पक्षं पराजयन्ति; तस्मात् जयपराजयौ दैवाधीनौ पाशाश्रितौ। ततो हि पराजयरूपो दोषः प्राप्यते। वयं अपि पराजयशङ्कां वहामः, तथापि दीव्यामः। अतः भूमिपाल! मा शङ्कां कुरु; पाणं निधेहि; इदानीं मा विलम्बस्व।
युधिषछिर उवाच