एतादृशस्य किं मेडद्य जीवितेन विशाम्पते । वर्धन्ते पाण्डवा नित्यं वयं त्वस्थिरवृद्धय:,महाराज! आज जो मेरी दशा है, इसमें मेरे जीवित रहनेसे क्या लाभ? पाण्डव प्रतिदिन उन्नति कर रहे हैं और हम लोगोंकी वृद्धि (उन्नति) अस्थिर है--अधिक कालतक टिकनेवाली नहीं जान पड़ती है
एतादृशस्य किं मेऽद्य जीवितेन विशाम्पते । वर्धन्ते पाण्डवा नित्यं वयं त्वस्थिरवृद्धयः ॥
दुर्योधन उवाच