Nāradasya Rājadharma-praśnāḥ
Nārada’s Examination of Royal Ethics
उसी समय वेद और उपनिषदोंके ज्ञाता, ऋषि, देवताओंद्वारा पूजित, इतिहास-पुराणके मर्मज्ञ, पूर्वकल्पकी बातोंके विशेषज्ञ, न्यायके विद्वान, धर्मके तत्त्वको जाननेवाले, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन््द और ज्यौतिष--इन छहों अंगोंके पण्डितोंमें शिरोमणि, ऐक्यर, संयोगनानात्व“४ँ और समवाय केः० ज्ञानमें विशारद, प्रगल्भ वक्ता, मेधावी, स्मरणशक्तिसम्पन्न, नीतिज्ञ, त्रिकालदर्शी, अपर ब्रह्म और परब्रह्मको विभागपूर्वक जाननेवाले, प्रमाणोंद्वारा एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँचे हुए, पंचावयवयुक्त- वाक्यके गुण- दोषको जाननेवाले, बृहस्पति-जैसे वक्ताके साथ भी उत्तर-प्रत्युत्तर करनेमें समर्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष--चारों पुरुषार्थोंके सम्बन्धमें यथार्थ निश्चय रखनेवाले तथा इन सम्पूर्ण चौदहों भुवनोंको ऊपर, नीचे और तिरछे सब ओरसे प्रत्यक्ष देखनेवाले, महाबुद्धिमान, सांख्य और योगके विभागपूर्वक ज्ञाता, देवताओं और असुरोंमें भी निर्वेद (वैराग्य) उत्पन्न करनेके इच्छुक, संधि और विग्रहके तत्त्वको समझनेवाले, अपने और शत्रुपक्षके बलाबलका अनुमानसे निश्चय करके शत्रुपक्षके मन्त्रियों आदिको फोड़नेके लिये धन आदि बाँटनेके उपयुक्त अवसरका ज्ञान रखनेवाले, संधि (सुलह), विग्रह (कलह), यान (चढ़ाई करना), आसन (अपने स्थानपर ही चुप्पी मारकर बैठे रहना), द्वैधीभाव (शत्रुओंमें फूट डालना) और समाश्रय (किसी बलवान् राजाका आश्रय ग्रहण करना)--राजनीतिके इन छहों अंगोंके उपयोगके जानकार, समस्त शास्त्रोंके निपुण विद्वान, युद्ध और संगीतकी कलामें कुशल, सर्वत्र क्रोधरहित, इन उपर्युक्त गुणोंके सिवा और भी असंख्य सदगुणोंसे सम्पन्न, मननशील, परम कान्तिमान् महातेजस्वी देवर्षि नारद लोक-लोकान्तरोंमें घूमते- फिरते पारिजात, बुद्धिमान् पर्वत तथा सौम्य, सुमुख आदि अन्य अनेक ऋषियोंके साथ सभामें स्थित पाण्डवोंसे प्रेमपूर्वक मिलनेके लिये मनके समान वेगसे वहाँ आये और उन ब्रह्मर्षिनी जयसूचक आशीर्वादोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरका अत्यन्त सम्मान किया ॥| २-- १२ || तमागतमृषिं दृष्टवा नारदं सर्वधर्मवित् । सहसा पाण्डवश्रेष्ठ: प्रत्युत्थायानुजैः सह,सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने देवर्षि नारदको आया देख भाइयोंसहित सहसा उठकर उन्हें प्रेम, विनय और नम्रतापूर्वक उस समय नमस्कार किया और उन्हें उनके योग्य आसन देकर धर्मज्ञ नरेशने गौ, मधुपर्क तथा अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करते हुए रत्नोंसे उनका विधिपूर्वक पूजन किया तथा उनकी सब इच्छाओंकी पूर्ति करके उन्हें संतुष्ट किया
tam āgatam ṛṣiṁ dṛṣṭvā nāradaṁ sarvadharmavit | sahasā pāṇḍavaśreṣṭhaḥ pratyutthāyānujaiḥ saha ||
ततो देवर्षिर्नारदः परमकान्तिमान् महातेजाः पारिजातेन धीमता पर्वतेन सौम्येन सुमुखेन चान्यैश्च बहुभिर्ऋषिभिः सहितः लोकलोकान्तरान् विचरन् पाण्डवान् सभास्थान् प्रीत्या द्रष्टुं मनोजवेन तत्राजगाम । स च ब्रह्मर्षिः जयाशीर्भिर् धर्मराजं युधिष्ठिरं समर्चयामास । तमागतमृषिं दृष्ट्वा नारदं सर्वधर्मवित् । सहसा पाण्डवश्रेष्ठः प्रत्युत्थायानुजैः सह ॥ स प्रेम्णा विनयेनैव नम्रतया च तं तदा । प्रणम्योपावेशयद् योग्ये आसने धर्मवित्तमः ॥ गवां मधुपर्कमर्घ्यादीन् उपचारान् यथाविधि । रत्नैश्च विधिवत् पूजां कृत्वा तुष्टिं चकार तम् ॥
वैशम्पायन उवाच
The passage highlights rājadharma expressed through atithi-satkāra: a righteous ruler honors spiritual authority and guests promptly and properly—rising in respect, offering a seat, and performing prescribed hospitality rites (arghya, madhuparka, gifts). Ethical kingship is shown not by power alone but by humility, restraint, and adherence to dharma.
Devarṣi Nārada arrives at the Pāṇḍavas’ assembly. Yudhiṣṭhira immediately stands with his brothers, bows, offers Nārada an honored seat, and performs formal hospitality and worship with traditional offerings and gifts, ensuring the sage is satisfied.