दिव्यैर्ननाविधैभविर्भासद्धिरमितप्रभै:,अनन्त प्रभावाले नाना प्रकारके प्रकाशमान दिव्य पदार्थोद्वारा अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यसे भी अधिक स्वयं ही प्रकाशित होनेवाली वह सभा अपने तेजसे सूर्यमण्डलको तिरस्कृत करती हुई-सी स्वर्गसे भी ऊपर स्थित हुई प्रकाशित हो रही है
दिव्यैर्नानाविधैर्भावैर्भासद्भिरमितप्रभैः । स्वयम्प्रभा सा सभा राजन् भर्त्सयन्तीव भास्करम् ॥
नारद उवाच