अध्याय १: उत्पात-दर्शनम् तथा वृष्णि-विनाश-श्रवणम्
Omens Observed and the Hearing of the Vṛṣṇi Destruction
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये... १५॥ प अं १५॥ आश्रमवासिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या -- ११०९। भीकम (0) अमान साम्बके पेटसे यदुवंश-विनाशके लिये मूसल पैदा होनेका ऋषियोंद्वारा शाप ॥ ३० श्रीपरमात्मने नम: ।। श्रीमहाभारतम् मौसलपर्व प्रथमो 5 ध्याय: युधिष्ठटिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।। अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ।। वैशम्पायन उवाच षट्त्रिंशे त्वथ सम्प्राप्ते वर्ष कौरवनन्दन: । ददर्श विपरीतानि निमित्तानि युधिष्ठिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! महाभारत युद्धके पश्चात् जब छत्तीसवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ तब कौरवनन्दन राजा युधिष्ठिरको कई तरहके अपशकुन दिखायी देने लगे अनायास ही महान् कर्म करनेवाले बलरामजीका यह शासन समझकर सब लोगोंने राजाके भयसे यह नियम बना लिया कि “आजसे न तो मदिरा बनाना है न पीना' ।। इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि मुसलोत्पत्तौ प्रथमो5ध्याय:
vaiśampāyana uvāca |
ṣaṭtriṃśe tv atha samprāpte varṣe kauravanandanaḥ |
dadarśa viparītāni nimittāni yudhiṣṭhiraḥ ||
वैशम्पायन उवाच—कौरवनन्दन, महायुद्धानन्तरं षट्त्रिंशे वर्षे सम्प्राप्ते राजा युधिष्ठिरो विपरीतानि निमित्तानि ददर्श। तानि निमित्तानि धर्मस्य क्षयमिव सूचयन्ति; यदा हि धर्मो लीयते तदा जगदेव साधून् प्रति भयावहानि संकेतैः प्रबोधयति।
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights a classical Mahābhārata ethic: when collective conduct declines and a great downfall approaches, nature and circumstance manifest ‘nimittas’ (portents). For a dharmic ruler like Yudhiṣṭhira, attentiveness to such signs is part of responsible kingship—recognizing that moral disorder has consequences beyond the individual.
At the opening of the Mausala Parva, Vaiśampāyana reports that in the thirty-sixth year after the war, Yudhiṣṭhira begins to see adverse omens. This sets the stage for the coming catastrophe—events leading toward the destruction of the Yādavas and the closing movement of Kṛṣṇa’s earthly līlā.