कर्ण तु शूरं पतितं पृथिव्यां शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् । यदृच्छया सूर्यमिवावनिस्थं दिदृक्षव: सम्परिवार्य तस्थु:,शूरवीर कर्ण पृथ्वीपर पड़ा हुआ था। उसके शरीरमें बहुत-से बाण व्याप्त हो रहे थे तथा सारा अंग खूनसे लथपथ हो रहा था। उस अवस्थामें दैवेच्छासे पृथ्वीपर उतरे हुए सूर्यके समान उसे देखनेके लिये सब लोग उसकी लाशको घेरकर खड़े हो गये
karṇaṃ tu śūraṃ patitaṃ pṛthivyāṃ śarācitaṃ śoṇitadigdhagātram | yadṛcchayā sūryam ivāvani-sthaṃ didṛkṣavaḥ samparivārya tasthuḥ ||
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां शराचितं शोणितदिग्धगात्रम्। यदृच्छया सूर्यमिवावनिस्थं दिदृक्षवः सम्परिवार्य तस्थुः॥
संजय उवाच