इस प्रकार श्रीमह्याभारत कर्णपर्वमें कर्णके रथके पह्ियेका पृथ्वीमें फैसना--इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९० ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ११८ श्लोक हैं।) वश ःःस बछ। अप ऋाल>ज | ः ! कर्णद्वारा पृथ्वीमें एकनवतितमो<ध्याय: भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको चेतावनी देना और कर्णका वध संजय उवाच तमब्रवीद् वासुदेवो रथस्थो राधेय दिष्ट्या स्मरसीह धर्मम् प्रायेण नीचा व्यसनेषु मग्ना निन्दन्ति दैवं कुकृतं न तु स््वम्,संजय कहते हैं--राजन्! उस समय रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने कर्णसे कहा --राधानन्दन! सौभाग्यकी बात है कि अब यहाँ तुम्हें धर्मकी याद आ रही है! प्राय: यह देखनेमें आता है कि नीच मनुष्य विपत्तिमें पड़नेपर दैवकी ही निन््दा करते हैं। अपने किये हुए कुकर्मोंकी नहीं
sañjaya uvāca | tam abravīd vāsudevo rathastho rādhēya diṣṭyā smarasīha dharmam | prāyeṇa nīcā vyasaneṣu magnā nindanti daivaṃ kukṛtaṃ na tu svam ||
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णरथचक्रपृथिव्यां निमग्नवृत्तान्तसम्बद्धो नवतितमोऽध्यायः समाप्तः ॥९०॥ अथैकनवतितमोऽध्यायः। सञ्जय उवाच—ततः रथस्थो वासुदेवः राधेयम् अब्रवीत्—“दिष्ट्या स्मरसि धर्ममिह। प्रायेण नीचाः व्यसनेषु मग्नाः दैवमेव निन्दन्ति, न तु स्वकृतं कुकृतम्।”
संजय उवाच
Krishna underscores moral accountability: in adversity, one should not blame fate alone but recognize one’s own actions (kukṛta) and responsibility within dharma.
On the battlefield, Krishna—on the chariot—addresses Karna at a critical moment, remarking pointedly that Karna’s sudden appeal to dharma in crisis contrasts with the common tendency to blame destiny rather than one’s own wrongdoing.