तमस्य हर्ष ममृषे न पाण्डवो बिभेद मर्माणि ततो<स्य मर्मवित् । पर:शतै: पत्रिभिरिन्द्रविक्रम- स्तथा यथेन्द्रो बलमोजसा रणे,उसके उस हर्षको पाण्डुपुत्र अर्जुन सहन न कर सके। वे उसके मर्मस्थलोंको जानते थे और इन्द्रके समान पराक्रमी थे। अतः जैसे इन्द्रने रणभूमिमें बलासुरको बलपूर्वक आहत किया था, उसी प्रकार अर्जुनने सौसे भी अधिक बाणोंद्वारा कर्णके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर दिया
tam asya harṣaṁ mamṛṣe na pāṇḍavo bibheda marmāṇi tato 'sya marmavit | paraḥ-śataiḥ patribhir indra-vikramaḥ tathā yathendro balam ojasā raṇe ||
सञ्जय उवाच—तमस्य हर्षं ममृषे न पाण्डवो बिभेद मर्माणि ततोऽस्य मर्मवित्। परःशतैः पत्रिभिरिन्द्रविक्रमस्तथा यथेन्द्रो बलमोजसा रणे॥
संजय उवाच